जब बाबा तिलका मांझी ने जगाई विद्रोह की ज्योत

[अंग्रेजी सत्ता के ख़िलाफ़ विद्रोह का बिगुल बजाने वाले आदि क्रांतिकारी तिलका माझी की कहानी]

अंग्रेज़ों की लूट और बाबा तिलका मांझी का विद्रोह

अंग्रेज़ों के आने के पहले बंगाल और बिहार की सीमा पर राजमहल इलाक़े में रहने वाले आदिवासियों के पास जंगलों पर पूरा अधिकार था।

लेकिन अंग्रेज़ों ने अपनी लूट के लिए उनसे जब यह अधिकार छीनने की कोशिश की तो 1784 में विद्रोह सुलग उठाया। इस विद्रोह के नेता थे बाबा तिलका मांझी

उन्होंने भागलपुर के अंग्रेज़ कलेक्टर क्लीवलैंड की हत्या कर दी।

फिर तो अंग्रेज़ों ने एक बड़ी सेना भेज दी उन्हें पकड़ने के लिए। सेना ने पूरे जंगल को घेर लिया लेकिन बाबा अपने लोगों के साथ महीनों उन्हें छकाते रहे। कई विद्रोही शहीद हुए और अंत में बाबा भी घायल हो गए।

 

अंग्रेज़ क्रूरता की हद पार करते हुए उनकी घायल देह को घोड़े से घसीटते हुए भागलपुर तक ले गए और वहाँ उनकी मृत देह को बरगद के एक पेड़ से लटका दिया।

बाबा तिलका मांझी की यह वीरता और शहादत जनता कभी नहीं भूली।  आज़ादी के बाद उसी जगह उनकी एक मूर्ति की स्थापना की गई।  बांग्ला की सुप्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी ने उनके जीवन और विद्रोह पर बांग्ला भाषा में एक उपन्यास ‘शालगिरर डाके’ की रचना की है।  यह उपन्यास हिंदी में ‘शालगिरह की पुकार पर’ नाम से अनुवादित और प्रकाशित हुआ है।

आज जब जल-जंगल-ज़मीन की लूट का एक नया दौर हमारे सामने है तो बाबा तिलका मांझी हमारे लिए एक प्रेरणास्रोत हैं।


 

स्रोत

पेज 18-19, India’s Struggle for Freedom, (Ed.) Chinmohan Sehanbis et al, Department of Information and Cultural Affairs, Government of West Bengal, 1987

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