शहीद शेर अली आफ़रीदी जिनको दो बार फांसी की सजा दी गई

हिन्दुस्तान की आज़ादी के लिए ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों के नाम मशहूर हैं, जिनके नेतृत्व में हज़ारों देशवासियों ने जंगे आज़ादी में भाग लिया। उसके आन्दोलनों, सत्याग्रहों, जलसों एवं जुलूसों के कारण इतिहास के कई पन्ने भरे पड़े हैं। इनके अलावा भी आज़ादी के ऐसे  हज़ारों मतवाले थे जिन्होंने अपने जोश, वतन प्रेम के जज़्बे, आज़ादी से मुहब्बत के चलते हथियार भी उठाए।

ऐसे ही सूरमाओं की गुमनाम सूची में शहीद शेर अली का नाम आता है, जिनके बारे में बहुत ही कम बात होती है। उन्हें एक, दो बार मौत की सजा सुनाई गई। इतिहास में शहीद शेर अली शायद पहले व्यक्ति हैं जिनको दो बार मौत की सज़ा  सुनाई गई।

 

कौन थे शहीद शेर अली आफ़रीदी

शेर अली ब्रिटिश प्रशासन में साधारण अर्दली थे। जिन्होंने कई मोर्चों पर ब्रिटिश प्रशासन के अधीन अपनी सेवाएँ दी थी। शेर अली ने ग़दर  के बाद के दिनों में पंजाब माउंट पुलिस में ब्रिटिश प्रशासन के लिए  और पेशावर के आयुक्त के लिए काम किया था।

इससे पहले उन्होंने स्वतंत्रता के प्रथम युद्ध के दौरान रोहिलखंड और अवध में एक घुड़सवार रेजिमेंट में और प्रेसीडेंसी सेनाओं में अंबाला में सेवा की थी। मेजर ह्यूग जेम्स ने उन्हें एक प्रमाण पत्र से सम्मानित किया था और रेन टेनर ने उन्हें एक घोड़ा और पिस्तौल उपहार में दी थी।

 

क्यों हुई थी शेर अली को काला-पानी की सजा

एक पारिवारिक विवाद में शेर अली पर अपने एक रिश्तेदार को मार देना का इल्ज़ाम लगा था। शेर अली चूंकि अपने बेहतरीन सेवा के लिए ब्रिटिश अधिकारियों के बीच मशहूर था इसलिए उसे लगता था कि शायद सज़ा न हो।

 परंतु, 2 अप्रैल 1867 को शेर अली को फांसी सुना दी गई। अपील करने पर उसकी सजा को न्यायाधीश ने कम कर उम्र कैद में बदल दिया और अंडमान के जेल में भेज दिया गया।

हालांकि बाद में वह सज़ा उम्र कैद में बदलकर उन्हें काला पानी  भेज दिया गया था।

 

क्यों नफ़रत करने लगे शेर अली फ़िरंगियों से

यहीं से गोरों के प्रति घृणा शेर अली के मन में बैठ गई। शेर अली अपनी सजा काले पानी में काट रहे थे, कैद के दौरान उनके साथ अमानवीय व्यवहार ने आग में घी डालने का काम किया।

मौलाना मो. जाफर अली थानेश्वरी जो राजनीतिक कैदी के रूप में अंडमान जेल में थे बाद में उर्दू से अपनी आत्मकथा में शेर अली के बारे में लिखा।

काले पानी के जेलों में सजा काटते हुए शेर अली के अंदर फिरंगी शासन के खिलाफ गुस्सा कम नहीं हो रहा था, यह गुस्सा धीरे-धीरे एक बड़ी नफरत में तब्दील हो रहा था। जैसे-जैसे समय बदलता जा रहा था, अंग्रेजों से बदला लेने की चाहत बढ़ती जा रही थी। शेर अली किसी भी हालत में फिरंगियों से बदला लेना चाहते थे।

 


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क्या थी लार्ड मेयो हत्या-कांड की घटना

शेर अली को यह मौक़ा जल्द ही नसीब हुआ। जब 1872 में उस समय के वायसराय लार्ड मेयो मुआयने पर अंडमान जेल आए। लार्ड मेयों अपनी सख्तियों के लिए अंडमान के कैदियों में बहुत बदनाम था। उनके आने के तैयारी में जेल के मुलाज़िमों और कुछ कैदियों द्वारा लार्ड मेयो के स्वागत की तैयारी की गई। अडंमान की पोर्ट ब्लेयर स्थित सेल्युलर जेल को खूब सजाया गया। कैदियों से कहा गया वे अपने अंग्रेज आका का धूमधाम से स्वागत करे।

 

वहावी पठान शेर अली पहले से ही इस तरह के मौके के तलाश में थे, जिससे वह अपने बदले और नफरत के चिंगारी को सही अंजाम दे सके।

जिस वक्त जेल के अधिकारी और कर्मचारी लार्ड मेयो का स्वागत कर रहे थे, बहादुर शेर अली ने अपने घेरे को तोड़कर भूखे शेर की भांति वायसराय के अंगरक्षकों को चीरता-फाड़ता हाथ में खंजर लिये लार्ड मेयों पर टूट पड़ा।

लार्ड मेयो के पेट पर वार कर उनका पेट अपने छुरे से चीर डाला। इससे पहले की साहिब का स्वागत पूरा होता, लोग अवाक रह गए और क्षणभर में ही लहूलुहान वायसराय ने दम तोड़ दिया। शेर अली के पास पूरा मौका था कि अफरा-तफरी के महौल में वह भाग निकलता परंतु शेर अली चुपचाप खड़े रहे और अपनी गिरफ्तारी दी।

 

अपनी फांसी पर कोई अफसोस नहीं था शेर अली को

शेर अली को फिर से गिरफ्तार करके अदालत में पेश किया गया। अब इस घटना के बाद शेर अली के दिल में बदले की आग कुछ ठंडी पड़ गई थी।

उन्होंने मुकदमे के दौरान अपना अपराध स्वीकार किया और कहा, जब मैं अपने देश की आज़ादी के लिए आन्दोलन में शामिल हुआ तो मैंने अपने जीवन पर सभी उम्मीदें छोड़ दी। मैं कम से कम हमारे एक दुश्मन को खत्म करने में सक्षम था। आप सब अल्लाह के दरबार में मेरे नेक कदम के साक्षी बनेगे।

अंत में वही हुआ, जिसके बारे में शेर अली ने सोच रखा था। अदालत का हुक्म हुआ और 11 मार्च 1873 को फांसी के फंदे पर लटका कर  शहीद कर दिया गया। फांसी दिए जाने से पहले शेर अली ने कहा कि उसे अपने किए पर पछतावा नहीं है, बल्कि गर्व महसूस हो रहा है।

स्वतंत्रता सेनानी शेर अली का कारनामा इतिहास में अमर हो गया।


सदर्भ स्त्रोत

[1]  Saturday Review:Political,Literature, Science and Art, Volume 33, Issue No,851, 17 Feb 1872,London

[1]  मेवाराम गुप्त सितोरिया, हिंदुस्तान की जंगे आजादी के मुसलिम मुजाहिदीन, किताबघर, मुम्बई, 1988 एंव 2012, पेज न. 74: अमीर अदर्वी, तहरीके आज़ादी और मुसलमान, पेज न 86